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रामजन्मभूमि- बाबरी विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका को संविधान पीठ के पास भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को वर्ष 1993 के अयोध्या अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को अयोध्या मामले की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ को भेज दिया है जिसके तहत केंद्र ने विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर और आस-पास के क्षेत्रों सहित 67.703 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ ने निर्देश दिया, “पीठ के सामने इसे सूचीबद्ध करें।” वहीं अयोध्या विवाद मुकदमे की अपील में मुस्लिम पक्ष के वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने अदालत से कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे पर वर्ष 1994 में इस्माइल फारुकी फैसले में संविधान पीठ द्वारा निर्णय लिया जा चुका है। इसलिए 27 साल बाद इस पर पुर्नविचार नहीं किया जा सकता। “हम इसे उस बेंच को भेज रहे हैं। इसे वहां आने दें,” चीफ जस्टिस गोगोई ने जवाब दिया। वर्तमान याचिका इस तथ्य के बावजूद दायर की गई है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस्माइल फारुकी मामले में अपने वर्ष 1994 के फैसले में पहले ही धारा 4 की उपधारा (3) को छोड़कर अयोध्या अधिनियम की वैधता को बरकरार रखा था। राम लला के भक्त होने का दावा करने वाले लखनऊ के 2 वकीलों सहित कई व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका में भूमि का अधिग्रहण करने की संसद की विधायी क्षमता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वर्ष 1993 के अधिनियम ने संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता, अभ्यास और धर्म के प्रचार) के तहत संरक्षित हिंदुओं के धर्म के अधिकार का उल्लंघन किया है। याचिका में अदालत और केंद्र सरकार से उत्तर प्रदेश सरकार को हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग की गई है, जिसमें विशेष रूप से राम से संबंधित भूमि पर अधिनियम के तहत 67.703 एकड़ भूमि के भीतर स्थित पूजा स्थलों पर पूजा, दर्शन और अनुष्ठान में हस्तक्षेप करने से रोक दिया गया है। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में उस वक़्त एक बड़ा ट्विस्ट आ गया जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर, बाबरी- रामजन्मभूमि की विवादित भूमि के आसपास अधिग्रहीत की गई “निर्विवाद” भूमि को वापस देने की अनुमति मांगी है। केंद्र की अर्जी के मुताबिक केंद्र ने अयोध्या में 67.703 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था, जिसमें उस भूखंड को भी शामिल किया गया था, जिसपर बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाने वाले ढांचा स्थित था। ये जमीन अयोध्या अधिनियम, 1993 के तहत अधिग्रहीत की गई। विवाद केवल 0.313 एकड़ भूमि से संबंधित है, जहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी, और ऐसा कहा गया कि अतिरिक्त भूमि को उसके सही मालिकों को वापस करने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसमें 42 एकड़ भूमि रामजन्मभूमि न्यास की है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के वर्ष 2003 के असलम भूरे बनाम राजेंद्र बाबू केस में फैसले को संशोधित करने की मांग की है जिसमें कहा गया था कि अतिरिक्त जमीन को असल विवाद के निपटारे के बाद वापस किया जाएगा। केंद्र की अर्जी ऐसे समय में आई है जब सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संविधान पीठ, जमीनी विवाद की सुनवाई को तैयार है।जमीन विवाद पर सुनवाई करने के लिए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने नई संविधान पीठ का गठन किया है जिसमें जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर को फिर से शामिल किया गया है। अब इस पीठ में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. ए. बोबडे, डी. वाई. चंद्रचूड, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर होंगे। पीठ में जस्टिस एन. वी. रमना को शामिल नहीं किया गया है, जबकि जस्टिस यू. यू. ललित ने इस मामले की सुनवाई से खुद को पहले ही अलग कर लिया था। 10 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संविधान पीठ में इस मामले की सुनवाई उस वक्त टल गई थी जब पीठ में शामिल जज जस्टिस यू. यू. ललित ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था, क्योंकि वो वर्ष 1997 में बाबरी मस्जिद मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए पेश हुए थे। नई पीठ को 29 जनवरी को इस मामले की सुनवाई करनी थी, लेकिन जस्टिस बोबड़े के छुट्टी पर होने की वजह से सुनवाई टल गई है।

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